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Showing posts from 2016

तुलना

                        तुलना करते तुलना यहाँ सभी अपने आस-पास के सभी से l होते कभी खुश तो जाते कभी रूठ, सोच के ये कि उनमें कुछ कमी हैं ll कमी तो यहाँ हर इन्सान को कुछ न कुछ उस ईश्वर से प्राप्त  हैं l ये सब जानते हुए भी क्यों हम सब इस बात से अज्ञात  हैं ll क्यों मान लेते  हम  स्वयं को पिछडा तुलना किसी श्रेष्ठ से करके l सोचते क्यों नहीँ कि जिन्दगी मे हर दिन एक से नहीँ हुआ करते ll किसी से तुलना करके मान लेते  हम  खुद को श्रेष्ठ l ओढ़ लेते चादर अभिमान की बजाए सहायता  किये  उसकी बनने मे श्रेष्ठ ll ईश्वर कि ये दुनिया बड़ी सुन्दर हें बन जाती l होती जब दुर हम से तूलना करने की ये बीमारी ll तुलना करने का सही मतलब अब तुम समझो l तुलना करके हि तुम अपने रास्ते मे न भटको  ll देखा हें  कभी चाँद - सूरज काँटे और फूल को उलझे हुए तुलना के जाल मे l करने लगे जो तुलना ये आपस मे तो क्या हो पायेगे कामयाब इस संसार मे ll तुलना करके स्वयं की करो न अपमान उस ...

A Half Engineer

Hii guys This is Aman Soni. Here I described the condition of an engineering student who is completed second year . You have never read this type of poem because it is neither in Hindi nor in English but it is written in Hinglish language                                  A Half Engineer               Finally ho gya second year complete Pta nhi kis field me ho gi meri जीत Koi kehta he krlo clear gate Aur khol do success k बंद पड़े gate Koi kehta bn ja coding me xपरट Le jayegi koi bhi MNC krke xपोर्ट Koi kehta networking me जमा लो हाथ At&T ya Emc me bn jayegi बात Campus selection k liye hona English जोरदार Hindi to  ठिक se aati ni ab english.   कौन  Sikhega yrr 1st sem मे तो tha bda जोश       सोचा Apne CGPA se uda dege sbke होश 2nd Sem मे  result Jo आया CGPA to chodo back se jese tese  khud ...

मन से मन की बात

                            मन से मन की बात कुछ करने कि आज मेंने हे ठानी l कुछ नया सीखने कि जिज्ञासा मन मे जागी ll मुसीबतें तो हे आनी जानी l न चलने दूँगा हालतों कि मुझ पर मनमानी ll महनत कुंजी सफलता कि यह  बात हे मेंने जानि l खुशियों के परिन्दों को यह कुंजी हे आजाद करने वाली ll मेरे विचारों की धारा अब न भटकने वाली l फूलों जेसे  सपनों की हिफाज़त करूँगा बनकर बगीचे का माली ll हे दौड़ मे न जाने कितने सहभागी l निकलूंगा दौड़ मे सबसे आगे बनकर सबका साथी ll जाने कितनी ठोकरें हे मेंने खाई l इन्हीं ठोकरौ ने मुझे अपनी कम्ज़ोरियां हे दर्शाई ll कुछ अनोखा न सही कुछ अनदेखा न सही l कुछ तो ऐसा जो मिला दे  मुझे अपनी मंजिल से इस राह मे कहीँ  ll पराजय होने की घबराहट अब न देर तक रहने वाली l जीत की मुस्कुराहट अब इस घबराहट पे हावी होने वाली ll जीवन मे लगे जो कभी मुसीबतों की झड़ी l चलता रहुंगा अपनी मंजिल पर बनाए नज़रें कड़ी ll सकारात्मक विचारों की महिमा हे बड़ी l इन विचारों को साथ जब चलता रह...

मजेदार M 2

In this poem the feelings of an engineering student has been mentioned. He is very happy , because after 1 month his examination of 3rd sem is over. But he is worried about his Mathematics (M2) paper, because unfortunately this time the paper was too much hard and lengthy. M 2 पूरे सेमेस्टर भाया खुद पढ़ा  दूसरो को पढाया | परीक्षा मे पेपर सामने आया तो हमने अपना होश गंवाया || M 2 पढ़ेंगे M 2 पढ़ेंगे यही हठ किया करते थे | ये तो कभी सोचा ही नही था कि M 2 का पेपर हल भी कर सकेंगे || M 2 कि पढ़ाई M 2 के नोट्स | ईन सभी कि जुगाड़ मे उड़ा दिए हमने  न जाने कितने नोट || M 2 मस्त हे M 2 आसान हे M 2 स्कोरिन्ग हे | मगर किसे पता था कि ये ही सबसे बोरिंग हे || फोरियर सीरीस  निपटाने कि तो ठानी | देखा  तो एक भी सीरीस सिद्ध नही होने वाली || फोरियर  के ट्रान्सफार्म को आगे ट्रान्स्फर किया | लाप्लास के ट्रान्सफार्म का स्वागत किया || लाप्लास के ट्रान्सफार्म ने थोड़ी उमीद जगाई | औ तेरी ट्रान्सफार्म का इन्वरस भी निकालना पड़ता हे भाई || यूनिट 3 पूरा सिन्गुलर और ऑ...

कही गुमशुदा हे इन्सान

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कभी रोटी त्याग कर खिलौनों से घिर जाता इन्सान तो कभी  खिलौनों के माध्यम से रोटी पाता  इन्सान कभी खुशियों मे डूबता इन्सान तो कभी कठिनाइयों मे उलझता इन्सान कभी तरक्की से जलता इन्सान तो कभी तरक्की से निखरता इन्सान कभी राह भटकता इन्सान तो कभी मंजिल पा जाता इन्सान कभी तरस खाता इन्सान तो कभी तरस जाता इन्सान कभी किसी को नज़रंदाज़ करता इन्सान तो कभी किसी की नज़रों मे रहना चाहता इन्सान कभी शर्म से पिछड़ता इन्सान तो कभी श्रम से शर्म को पछाड़ता इन्सान कभी मिलता प्रेम ठुकराता इन्सान तो कभी प्रेम के अभाव मे उभ जाता इन्सान कभी अपने अतीत को अपना भविष्य मानकर घबराता  इन्सान | तो कभी अपने वर्तमान मे रह कर अपना भविष्य   बनाता इन्सान || कभी स्वयं को पराजित घोषित कर मन ही मन पराजित होता  जाता इन्सान | तो कभी पराजित होने के भय को पराजित कर सत्यता से रुबरु होता  इन्सान || कभी समीप हो कर भी अपनों  से बिछड़ता इन्सान | तो कभी बिछड़कर भी अपनों  के समीप रहता इन्सान || कभी फुलों की माला से मेहकना चाहता इ...