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कही गुमशुदा हे इन्सान

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कभी रोटी त्याग कर खिलौनों से घिर जाता इन्सान तो कभी  खिलौनों के माध्यम से रोटी पाता  इन्सान कभी खुशियों मे डूबता इन्सान तो कभी कठिनाइयों मे उलझता इन्सान कभी तरक्की से जलता इन्सान तो कभी तरक्की से निखरता इन्सान कभी राह भटकता इन्सान तो कभी मंजिल पा जाता इन्सान कभी तरस खाता इन्सान तो कभी तरस जाता इन्सान कभी किसी को नज़रंदाज़ करता इन्सान तो कभी किसी की नज़रों मे रहना चाहता इन्सान कभी शर्म से पिछड़ता इन्सान तो कभी श्रम से शर्म को पछाड़ता इन्सान कभी मिलता प्रेम ठुकराता इन्सान तो कभी प्रेम के अभाव मे उभ जाता इन्सान कभी अपने अतीत को अपना भविष्य मानकर घबराता  इन्सान | तो कभी अपने वर्तमान मे रह कर अपना भविष्य   बनाता इन्सान || कभी स्वयं को पराजित घोषित कर मन ही मन पराजित होता  जाता इन्सान | तो कभी पराजित होने के भय को पराजित कर सत्यता से रुबरु होता  इन्सान || कभी समीप हो कर भी अपनों  से बिछड़ता इन्सान | तो कभी बिछड़कर भी अपनों  के समीप रहता इन्सान || कभी फुलों की माला से मेहकना चाहता इ...